"चींटी की यात्रा – एक आत्मदर्शी कथा"
एक बार की बात है, एक छोटी सी चींटी थी। वह रोज़ की तरह भोजन की तलाश में अपने बिल से निकली। उसका लक्ष्य था – मिठास। कुछ मीठा मिल जाए, यही उसकी सबसे बड़ी चाह थी। उसने सुना था कि किसी दूर कोने में एक स्थान है जहाँ शुद्ध मिठास बिखरी पड़ी है – बिना किसी संघर्ष के। उसकी आँखों में उस मिठास का सपना बसा हुआ था। वह अपने रास्ते पर निकली – कंकड़ों को पार करती हुई, पत्तियों के नीचे से रेंगती हुई। रास्ते में कई चींटियों ने उसे टोकने की कोशिश की – “बहन, इस भटकाव से कुछ नहीं मिलेगा। यहाँ पास ही अनाज पड़ा है, वहीं चलो।” पर उसने मुस्कुराते हुए कहा, “नहीं, मुझे उस दिव्य मिठास की तलाश है। मेरे जीवन का अर्थ शायद वहीं छिपा है।” वह चलती रही… और अंततः, उसे वह मिठास मिल गई – एक चम्मच शक्कर के दाने, जो ज़मीन पर गिरे थे। उसकी आँखों में चमक आ गई। उसने स्वाद लिया – हाँ, वही था जिसकी कल्पना की थी। पर तभी, अचानक एक विशाल छाया उसके ऊपर आई – एक मानव का पैर। और पल भर में… सब समाप्त। इस दृश्य को दूसरी ओर से कुछ और चींटियों ने देखा, जो वापस अपने रास्ते लौट रही थीं। उनमें से एक वृद्ध चींटी बोली – “देखा? भटकाव की मिठास कितन...